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Thursday, September 11

पुस्तक मेला भाग दो

पुस्तक मेला शिक्षक दिवस पर गया था। एक काउंटर के बारे में बता ही चुका हूँ। एक और सरकारी संसथान पहुंचा। अन्य काउंटर के मुकाबले यहाँ बिल्कुल शांती छाई थी। लग रहा था इसका होना न होना एक जैसा है। काउंटर पर एक आदमी किताब पढ़ रहा था, मेरे टोकने पर उसने सर उठाया, मुझे देखते हुए कहा काउंटर के अन्दर आयें और किताब देखिये, पसंद आए तो ठीक है। कुछ किताबे देखने के बाद मैंने पाया अन्य के मुकाबले किताब यहाँ सस्ता है मगर जरुरत पुरा नही हो रहा। मीडिया नाम से दो त्रेमासिक इस्युए ख़रीदा, दस % छुट के साथ।

कंटर के बिक्री को लेकर केंद्रीय हिन्दी संसथान ( aagra ) से puchha तो उसने कहा भाई sahab sat सौ बेच चुका हूँ अब तक, मैंने कहा achchha sat सौ किताबे बेच चुके हो...
कहा नही sat सौ रुपये की किताबे बेच चुका हूँ।
केवल आज के दिन बिक्री है
नहीं भाई ३० agasta से अब तक का है।
सच कह रहे हो या majak है
सच कह रहा हूँ

संसथान का कितना kharch हो rha है couter लगाने का
ये मत पूछो sahab, जोड़ने lagoge तो ghaataa सुनकर achchha नही लगेगा... बुरा लगेगा। मत jano vahi achchha है।

sachchaii यह bhee है की लोग अब हिन्दी की kitabon पर पैसा kharch करना नही चाहते है। हिन्दी bhashee को गर्व होता है की हमे तो हिन्दी आती ही है, हिन्दी sik कर करना क्या है।

लोग भूल ja रहे है की हिन्दी जानने के लिए अब vishv pareshan है, आने वाले दिनों में हिन्दी rojgar का सशक्त sadhan banne ja रहा है, देर saber इसकी ghoshana bhee होगी लेकिन kaphee समय bit jane के बाद...

intazaar kariye जिस तरह shahron में हिन्दी bolee ja रही है और अब akhabaron की भाषा bhee जिस तरह badal रही है वो दिन dur नही kee की हिन्दी padhane के लिए landon से कोई अंग्रेज आएगा, जैसे अब आलू के chips khilane, ठंडा pilane के लिए am am see companee yaha आ रही hai

Sunday, September 7

पुस्तक मेले में काउंटर पर... डिसटर्ब मत करो

दिल्ली का १४ पुस्तक मेला का आज अन्तिम दिन है। पुस्तकों की भीड़ में कुछ किताब खरीदने की इच्छा से मैं भी दोस्त के साथ चला गया। अंग्रेजी में हाथ तंग होने कह लें या पैसे में, हिन्दी प्रकाशनों की और मुड गया।

जहाँ भी गया इस बार ज्यादातर पुस्तकें हार्ड बैंडिंग में था। इस कारन किताबों की कीमतें मेरे पहुँच से बाहर लगने लगा। भारतीय वैज्ञानिक शोध की किताबों की दुकान पर गया। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक देखा, अंदमान निकोबार द्वीप समूह के आदिवासियों के जीवन पर आधारित है। किताब बहुत होगा तो १०० पेज का। कीमत देखा तो हैरान। पाँच सो रुपये

काउंटर पर बैठने वाले से बात करने पर कहा, भाई लेना है तो बात करो, वरना हमें तंग मत करो। तंग करने का मतलब था तीन लोग आपस में अपने अपने बीबी को लेकर वर्तालाप कर रहे थे, डिसटर्ब जो हो गए। कीमत देखने के बाद हिम्मत नही हुअ।

हर तरफ़ से घूमते घामते केंद्रीय हिन्दी संसथान के काउंटर पर पहुंचे। दो किताबे लिया, मिडीया पत्रिका के दो अंक। दोनों अंक विशेषांक है। बिक्री और कीमत को लेकर बातचीत हुआ उसके बारे में अगले पोस्ट में लिखेंगे, अभी लिखने की इच्छा नही है