Friday, December 31

संसद जाम करने से बेहतर है ... सड़क जाम

भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ कि शीतकालीन सत्र बिल्कुल भी नहीं चला। एक पर एक घोटाले के पर्दाफाश के बाद संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग पर सत्तारूढ़ पार्टियां और विपक्ष आमने-सामने रहे। संसद नहीं चलने देने का आरोप भी एक-दूसरे पर मढ़ते रहे। इसी कड़ी में कांग्रेस के वुजुर्ग नेता प्रणव मुखर्जी ने संसद नहीं चलने देने का आरोप विपक्ष पर लगाते हुए देश से माफी मांगने को कहा।

प्रणव दा वित्त मंत्री हैं और लोकसभा के नेता भी। सो संसद सत्र नहीं चलने पर उनकी चिंता बेजा नहीं है। दादा आपने बात बिल्कुल सही कहा है कि विपक्ष को संसद नहीं चलने देने की माफी मांगनी चाहिए । देश की सबसे बड़ी पंचायत ही नहीं लोकतंत्र का आधार स्तंभ भी है संसद। करोड़ों रूपए खर्च कर देश में आम चुनाव कराया जाता है, इसलिए नहीं कि किसी ए क मुद्दे पर संसद की कार्यवाही को पूरी तरह से ठप कर दी जाए ।

संसद का शीतकालीन सत्र घोटालों के नाम रही। चाहे वो 1़7६ लाख करोड़ का 2जी स्पेट्रक्म घोटाले, 3़18 करोड़ रूपए का कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला या ए क हजार करोड़ रूपए का आदर्श सोसायटी घोटाले। इसकी सच्चाई क्या है, आपसे बेहतर कौन जानता होगा! घोटाले किसके शासन में नहीं हुए ? शासन चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, सबके शासनकाल में घोटाले हुए हैं। ए ेसी कोई पार्टी नहीं है जो कह सके कि उसके शासन में घोटाले नहीं हुए । इसके बावजूद जब राजनीतिक पार्टियां विपक्ष में होती हैं तो हाय तौबा मचाती ही है। विपक्ष में होने का मतलब ही हाय तौबा मचाना नहीं है। दादा आपने सही कहा है कि विपक्ष को घोटाले के नाम पर शीतकालीन सत्र चलने नहीं दी, इसके लिए उन्हें देश से माफी मांगनी चाहिए ।

आपके इस वक्तव्य से मुझे दशकों पहले अल्पायु में ही काल के गाल में समा जाने वाले कवि धूमिल की ए क कविता याद आती है। उन्होंने कहा- हे भाई/ अगर चाहते हो कि/ हवा का रूख बदले/ तो ए क काम करो/ संसद जाम करने से बेहतर है/ कि सड़क जाम करो। काश विपक्ष को धूमिल की कविता याद आ गई होती तो संसद सत्र में बाधा नहीं आती और प्रणव दा को माफी मांगने को कहने की जरूरत नहीं पड़ती। विपक्ष में बैठे राजनीतिक पार्टियों का काम संसद में केवल हंगामा करना ही काम नहीं है। घोटालों को लेकर जेपीसी सरकार गठित करने में पीछे हट रही है, इसको लेकर संसद चलने नहीं देने से क्या जेपीसी गठित हो गई। सरकार जेपीसी गठित कर भी दे तो इससे कितना र्फ पड़ेगा। घोटालों के इतिहास से तो यही लगता है कि कागजों का ए क बंडल और सरकारी रिकॉर्ड में बढ़ जाए गा। क्योंकि जेपीसी की रिपोर्ट जब तक आती लोग काफी हद तक भूल चुके होते। देश की आधी आबादी को तो पता भी नहीं होगा कि आखिर 2जी स्पेक्ट्रम किस बला का नाम है।

विपक्षी पार्टियों के लिए कितना अच्छा मौका था देश की जनता के पास जाने का। विपक्ष की राजनीतिक पार्टी के पास केवल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला ही नहीं, आदर्श घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, स्विस बैंक में पड़े देश के अरबों काला धन से लेकर महंगाई का मुद्दा भी है जिसे लेकर आम जन के पास जाया जा सकता है। महंगाई को वो मुद्दा है जो देश के प्रत्येक नागरिक के आर्थिक पक्ष को नुकसान पहुंचाया है। पार्टियां प्रखंड स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आंदोलन चलाती, देश के प्रत्येक नागरिक को इससे जोड़ने का प्रयास करती। इतना तय है कि सत्ता के मद में चूर लोगों को भी जनता के नाराज होने का भय सताता है। सत्ता सुख भोग रहे लोगों को पता है कि उन्हें जो सत्ता मिली है वह जनता के प्यार के कारण मिला है न की नाराजगी के कारण। वह अच्छी तरह जानते हैं कि जनता नाराज हो गई तो उन्हें सिंहासन से उतर कर पैदल होना पड़ेगा। ए ेसे में विपक्ष की मांग को मजबूरन माननी पड़ेगी।

हालांकि यह काम करने के लिए घर से बाहर निकल कर सड़क की धूल फांकनी पड़ेगी, राजधानी का सुख का परित्याग करना पड़ेगा। यहीं ए क यक्ष प्रश्न सामने आ जाता है। उस यक्ष प्रश्न को कविता के माध्यम से धूमिल ने व्यक्त किया है ‘मसला यह नहीं कि/ इसे हल कौन करेगा/ मसला यह है कि/ इसमें पहल कौन करेगा’।

Sunday, September 19


एक कण
नदी के सहारे
लुढ़कते हुए
कर सकता है
संसार गमन।



एक कण
हवा के सहारे
उड़ते हुए
कर सकता है
विश्व भ्रमण।



एक कण
देत्यों के आगे
आँखों में जा
करा सकता है
क्रूर क्रंदन।

एक कण
जिसका वजूद
राह के बड़े
पत्थर ही नहीं
विश्वात्मा बना
हिमालय से
जूडा है।

Friday, September 10

प्रोब्लम भास्ट

आन पड़ी है प्रोब्लम भास्ट
अपनी लवली कंट्री में
खाकी खोज रहा है हड्डी
लीडर मगन इलेक्शन में

शुरू हुआ इलेक्शन का खेल
सकसेस होगा तो कोई फेल
मिल रहा है सुनने को भाषण
दे रहा है अनेक आश्वासन

झूठे वादों से भर गया है कान
ऊब गया है मन
देती नहीं पब्लिक इसीलिए
लीडरों के स्टेटमेंट पर ध्यान

निकला था लालू का जिन्न
फर्जी मतपेटी व मतपत्र के रूप में
कह रहा है चुनाव आयोग
झूठा है ये सब आरोप

रिपोर्टरों के बीच किया
कृष्णामूर्ति ने किया खंडन
मत लगाया करो
चुनाव प्रक्रिया पर आरोप

सिद्ध करे इलेक्शन आयोग
पुर्नावालोकन अपनी प्रक्रिया से
बचा है क्या ये
घोटाले के चपेट से?

- इस कविता को मैंने तब लिखा जब लालू प्रसाद यादव बिहार की मुख्यमंत्री थे।
दीपक राजा

Thursday, September 9

ग्राम शोर्य की गाथाएं,

धर्म की जो परिकल्पना है
वो परिकल्पना साकार हो
है ग्राम शोर्य की गाथाएं,
फिर गाथाएं तैयार हो।

मुख में है वाणी हमारी
हाथों में हमारे काम हो
युगों से शोषित मानवों का
बस इतना अधिकार हो

एकता में जो अनेकता है
अनेक से सब एक हो
मिलते जुलते रहें हम सब
जोड़ें सबसे तार हो

स्वराज्य कब का ले चुके हम
लें दायित्व का भार हो
हर एक वतन का सैनिक है
हर दम रहें तैयार हो

Sunday, February 14

‘वैलेंटाइन डे’ ... त्योहार

निजी चैनल के एक इंटरव्यू में ‘विवादों की रानी’ के नाम से विख्यात आइटम गर्ल राखी सावंत ने कहा है कि लोग पसंद करें या नापसंद करें पर मुझे देखते सभी हैं। वैलेंटाइन डे के साथ भी कुछ ऐसा ही है। श्रीराम सेना, शिव सेना, बजरंग दल जैसे तमाम संगठन और उसके कार्यकर्ता चाहे जितना चिल्लम पो मचा लें, लेकिन सच यही है कि वैलेंटाइन डे पर हर तबके के लोगों ने अपने-अपने तरीके से अपने प्रेम का इजहार किया है।

प्यार करने वालों के लिए ‘वैलेंटाइन डे’ ठीक वैसा ही त्योहार है जैसे कि हम अपने आराध्य के लिए धूमधाम से साल में एक दिन करते हैं। भगवान गणेश के लिए गणपति बप्पा मोरया करते हैं तो आदिशक्ति दुर्गा के लिए दशहरा मनाते हैं। प्रेम करने वालों के लिए भी वैसा ही एक त्योहार है, एक दिन है जहां हम अपने प्यार करने वालों को अपने दिल की बात कहते हैं। उसके लिए पूरा एक दिन समय देते हैं।

साल में एक बार ऐसा अवसर आता है जब हर कोई सोचता है कि हम किसे चाहते-मानते है और कौन हमें मानता और चाहता है। ... इसे चाहे आप इजहार-ए -मोहब्बत कहें या फिर जुनून-ए-इश्क। ढाई आखर का प्रेम कभी भी किसी से हो सकता है।

वैलेंटाइन डे का विरोध करने वाले भी ऐसा नहीं है कि किसी से प्यार नहीं करते हैं। वह भी प्यार करते हैं मगर सभ्य होकर। पार्क और रेस्टोरेंट में बैठकर गलबहियां और चुम्मा-चाटी नहीं करते। हमें लगता है कि वैलेंटाइन डे के विरोधी वह भी नहीं है। वह विरोधी हैं तो प्यार और उसके इजहार के तरीके से जिसे भौड़ा प्रदर्शन कहा जा सकता है। भौड़ा प्रदर्शन को बढ़ावा बाजार ने दिया है। मुनाफाखोरों को जहां मुनाफा देखते हैं, वहीं नंगा नाच करते हैं और कराते भी है।

Thursday, February 11

नेतरहाट की तर्ज पर जमुई में विघालय

नामांकन प्रक्रिया शुरू, पहला सत्र इसी साल, डेहरी आ॓न सोन में खोला जाना प्रस्तावित

झारखंड के गठन के साथ ही बेहतरीन शिक्षण संस्थान नेतरहाट विघालय बिहार में नहीं रहा। इसकी कमी को दूर करने के लिए बिहार सरकार ने नेतरहाट की तर्ज पर दो विघालय खोलने की योजना बनाई है। प्रदेश के विघार्थियों के लिए बिहार सरकार का यह एक तोहफा है। पहला आवासीय विघालय जमुई जिले के सिमुलतला में खोला जा रहा है। पहला सत्र इसी साल जुलाई 2010 से शुरू हो जाएगा। इसके लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। दूसरा विघालय डेहरी-आ॓न-सोन में खोला जाना है।

नेतरहाट की तर्ज पर जमुई जिले के सिमुलतला में खोले जा रहे विघालय को सिमुलतला आवासीय विघालय के नाम से जाना जाएगा। सिमुलतला को ‘बिहार का शिमला’ कहा जाता है। यह पटना-हावड़ा मुख्य रेलवे मार्ग पर अवस्थित है। यहां एक सत्र में 120 विघार्थियों की पढ़ाई और रहने की व्यवस्था की जा रही है। इसमें 60 सीट यानि 50 प्रतिशत छात्राओं के लिए निर्धारित किया गया है। पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से की जाएगी जबकि इसके लिए लिए जा रहे प्रवेश परीक्षा का माध्यम हिन्दी ही रहेगा। पहले सत्र के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस विघालय के लिए चयनित छात्र और छात्राओं का सारा खर्च बिहार सरकार उठाएगी।

नामांकन प्रक्रिया : सिमुलतला आवासीय विघालय में नामांकन के लिए एक सौ रूपए का पोस्टल आर्डर जो कि निदेशक, माध्यमिक शिक्षा बिहार के नाम से होगा, के साथ एक आवेदन जमा करना होगा। इसके बाद एक ही दिन दो पाली में प्रथम जांच परीक्षा होगी। दूसरी पाली की कॉपी केवल उन्हीं विघार्थियों की जांची जाएगी जो पहली पाली में उत्तीर्ण होंगे। पहली पाली वस्तुनिष्ठ और दूसरी पाली लिखित में परीक्षा होगी। दोनों पाली में पास करने वाले विघार्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा। साक्षात्कार के दिन ही मेडिकल परीक्षण भी होगा। साक्षात्कार के दौरान विघार्थियों को तार्किक परीक्षा देनी होगी।

आवेदन प्रक्रिया
इच्छुक छात्र/छात्रा को अपने आवेदन पत्र सिमुलतला आवासीय विघालय, कैम्प कार्यालय, राजकीय बालक उच्च विघालय शास्त्री नगर पटना-800023 के पते पर रजिस्ट्री या स्पीड पोस्ट के माध्यम से भेजना होगा।

महत्वपूर्ण तिथि
आवेदन की अंतिम तिथि : 22 फरवरी 2010
प्रथम जांच परीक्षा की तिथि : 28 मार्च 2010
साक्षात्कार, स्वास्थ्य जांच की तिथि : 17 मई 2010

परीक्षा का प्रारूप
प्रवेश परीक्षा हिन्दी माध्यम में होगी। चयन परीक्षा दो भाग में है प्रथम जांच परीक्षा और साक्षात्कार। राज्य के सभी जिला मुख्यालय में प्रथम जांच परीक्षा होगी। साक्षात्कार के लिए बाद में स्थान तय किया जाएगा।

प्रथम जांच परीक्षा
प्रथम जांच परीक्षा दो पाली में होगी। जिन अभ्यर्थियों की पहली पाली में न्यूनतम निर्धारित अंक प्राप्त होंगे, उनके ही दूसरी पाली की परीक्षा के पत्र जांचे जाएंगे। इसके आधार पर मेधासूची तैयार की जाएगी। मेधासूची के बाद साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा। पहली पाली की परीक्षा सुबह दस बजे से दोपहर बारह बजे तक होगी। इसमें 120 प्रश्न वस्तुनिष्ठ होंगे। परीक्षा के प्रश्नों का आधारक विषय- गणित, सामान्य विज्ञान, हिन्दी, सामान्य ज्ञान, समाज अध्ययन (भूगोल, इतिहास एवं नागरिक शास्त्र) होंगे।

दूसरी पाली की परीक्षा दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक होगी। यह विषयनिष्ठ होगी। इस पाली में प्रश्नों के उत्तर लिखने होंगे। इन प्रश्नों के आधारक विषय वही होंगे जो पहली पाली के हैं।

साक्षात्कार परीक्षा
साक्षात्कार के साथ-साथ छात्र-छात्राओं की तार्किक परीक्षा (Logical Reasoning) भी ली जाएगी, जो दो घंटे की होगी।

आवेदन करने से पहले महत्वपूर्ण बात
1। यह विघालय केवल बिहार के छात्र/छात्राओं के लिए है।
2। किसी भी मान्यता प्राप्त विघालय में छात्र/छात्रा अध्ययनरत हों।
3। आवेदन करने वाले छात्र/छात्रा की उम्र 01।04।2010 को दस से बारह साल के बीच होनी चाहिए अर्थात् उनकी जन्मतिथि 31।03।1998 से 01।04।2010 के बीच होनी चाहिए (दोनों तिथियों को शामिल करते हुए )।
4। आवेदन पत्र विघालय के प्रधानाध्यापक द्वारा प्रमाणित होना चाहिए ।
5। साक्षात्कार के समय विघालय त्याग प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र (आरक्षित छात्र/छात्रों के लिए अनिवार्य), आवासीय प्रमाणपत्र एवं आय प्रमाणपत्र की मूल प्रति जमा करनी होगी।
6। बिहार सरकार का आरक्षण रोस्टर छात्र/छात्राओं के चयन प्रक्रिया में लागू होगी।
7. चयन परीक्षा के लिए आवेदन के साथ एक सौ रूपए का पोस्टल आर्डर निदेशक, माध्यमिक शिक्षा बिहार के नाम से संलग्न करना होगा।
8. आवेदन पत्र ए 4 साइज के पेपर के साथ टंकित कराकर जमा करना है। 9. आवेदन पत्र के साथ दो लिफाफा (पत्राचार का पता लिखा हो) और एक लिफाफे पर 22/ रूपए का डाक टिकट लगा हो, संलग्न होना चाहिए ।
10. आवेदन पत्र एवं संबंधित जानकारी विघालय के वेबसाइट
www.simultalavidyalaya.com तथा विभाग के वेबसाइट www.educationbihar.in पर उपलब्ध है।

Sunday, February 7

गायक जगजीत सिंह को ७०वीं वसंत की बधाई

शेरो शायरी में कहना हो मन की बात, दिल में जब भी उतरेगी प्यार और मोहब्बत के जज्बात, वफादारी की कसमें हो या नामुरादों-सी हालात, हर तरह के मन के लिए गजल रूपी पैयमाना जरूरी हो जाता है। ऐसे में, दिलकश, कशिश भरी आवाज कानों में बरवश ही गूंजने लगती है। आवाज उस शख्सियत की जिसके चेहरे पर सदैव संजीदगी झलकती है। उसका नाम है गायक जगजीत सिंह, गजल गायकी का बेताज बादशाह।
हाल ही में जगजीत सिंह ने गुरूवाणी को स्वर दिया है। हालांकि भक्ति संगीत में उनका यह पहला ए लबम नहीं है। ‘मां’, ‘हे राम ...हे राम’, ‘हरे कृष्ण’, जैसे भजन को अपना स्वर देकर सफलता का हीरा जड़ा है। वहीं उन्होंने कई फिल्मों में स्वर भी दिया है और संगीत भी। जगजीत सिंह पहले शख्स हैं जिन्होंने खास वर्ग में सुनी जा रही गजल को आम लोगों के बीच लोकप्रिय किया। इतना ही नहीं उर्दू भाषा में गाई जाने वाले गजल को बंगाली, पंजाबी, भोजपुरी, गुजराती व अन्य भाषाओं में गाकर जन-जन तक पहुंचाने का काम किया है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में आठ फरवरी 1941 को जन्मे जगजीत सिंह 70वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। इनके पिता सरकार अमर सिंह धीमान सरकारी कर्मचारी थे, जो मूलत: पंजाब के रोपड़ जिले के दल्ला गांव के निवासी थे। मां बच्चन कौर समराला के नजदीक ऑटाल्लान की थीं। चार बहनें और दो भाइयों में जगजीत सिंह का पुकारू नाम ‘जीत’ है। जगजीत सिंह की स्कूली शिक्षा खालसा उच्च विघालय श्रीगंगानगर में हुई जबकि इंटरमीडिएट की डिग्री गर्वनमेंट कॉलेज श्रीगंगानगर में पूरी की। जालंधर के डीएवी कॉलेज में स्नातक करने के बाद इतिहास विषय से स्नातकोत्तर की उपाधि कुरूक्षेत्र विश्वविघालय से प्राप्त किया। सरकारी मुलाजिम होने के नाते उनके पिता चाहते थे कि जगजीत प्रशासनिक अधिकारी बने लेकिन उन्होंने जगजीत के गायिकी की आ॓र रूझान को कभी दबाने का प्रयास नहीं किया।
बचपन से संगीत में रूची को देखते हुए उनके पिता धीमान ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा के लिए श्रीगंगानगर में ही पंडित चमनलाल शर्मा के पास भेज दिया। दो वर्षों तक पंडित चमनलाल शर्मा से उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा ली। हमेशा खुले विचार और किसी से सीखने की प्रवृत्ति रखने वाले जगजीत सिंह को जल्द ही ए चए मवी में रिकॉडिंग का मौका मिला। सन् 1965 में वह करियर के संघर्ष के लिए मुम्बई पहुंच गए। ये वो दौर था जब गजल का युग शुरू ही हुआ था विशेषकर हिन्दी में। हिन्दी में गजल लेखनी का आगाज दुष्यंत कुमार के कलम से इसी दौर में हुआ। करियर के शुरूआती दौर में पेईंग गेस्ट के रूप में रहते हुए गायिकी के हर तरह के प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार रहते। चाहे विज्ञापन फिल्म हो, पार्टी हो या विवाह का समारोह। इसी दौर में कलकत्ता की बंगाली बाला चित्रा से वर्ष 1967 में जगजीत सिंह की पहली मुलाकात हुई। यह मुलाकात चित्रा को 1969 में चित्रा सिंह बना दिया। मुलाकात और फिर शादी के बाद दोनों ने एक से बढ़कर एक गजलों का एलबम श्रोताओं को दिया। पश्चिम और भारतीय वाघ यंत्रों के साथ फ्यूजन, मिक्स अप कर गजल और नज्म में एक मिसाल पेश करते हुए पत्नी के साथ-साथ पहला एलबम ‘द अनफोरगेटेबल’ श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद एक सिलसिला सा शुरू हो गया, साथ-साथ गाने का। यह दौर 1990 तक चलता रहा।
बात 28 जुलाई 1990 की है, जो न केवल जगजीत-चित्रा के लिए ही नहीं बल्कि गजल के हर रसिकों के लिए काला दिन साबित हुआ। उस दिन उनका इकलौता बेटा विवेक सिंह की मुम्बई के ब्रीच केंडी में ए क सड़क हादसें में मौत हो गई। अचानक आई विपदा ने चित्रा सिंह को तोड़ कर रख दिया। उन्होंने गायिकी की दुनिया को सदा के लिए अलविदा कह दीं। चित्रा और जगजीत सिंह की जोड़ी का आखिरी ए लबम ‘समवन समवेयर’ है। बकौल चित्रा कहती हैं कि वह जब भी गाने के लिए माइक पकड़ती हैं, उन्हें विवेक का चेहरा दिखता है और उनके मुख से स्वर नहीं निकलता।
वो कौन है दुनियां में जिसे गम नहीं होता’ को ध्यान में रखते हुए इस त्रासदी से उबरने की कोशिश में जगजीत ने फिर ए क से ए क ए लबम प्रस्तुत किए । ‘होप’, ‘इनसर्च’, ‘चिराग’, ‘विजन’, ‘कहकसां’, ‘लव इज ब्लाइंड’, ‘मिराज’ आदि। जगजीत सिंह न केवल गायिकी में सक्रिय हैं बल्कि कई नए उभरते कलाकारों का मार्गदर्शन भी करते हैं। अभिजीत, तलत अजीज, विक्रम सिंह, घनश्याम वासवानी विनोद सहगल, कुमार सानू इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। क्राय, एलमा, बाम्बे हॉस्पीटल जैसे कई सामाजिक संगठनों से इनका गहरा नाता है।
संगीत, कला और सामाजिक कार्यों में रूझान व योगदान को देखते हुए जगजीत सिंह कई पुरस्कारों से सम्मानित हुए। मध्यप्रदेश सरकार ने लता मंगेशकर पुरस्कार (1998), साहित्य अकादमी ने मिर्जा गालिब सम्मान (1998) से नवाजा है तो भारत सरकार ने भी उन्हें पद्मश्री फिर पद्म भूषण (2003) देकर उनके काबिलियत का सम्मान किया है। जगजीत सिंह को 70वीं वसंत की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ उनसे अभी आ॓र उम्मीद हैं। गजल रसिकों को कुछ और नए अंदाज में उनके पुरकशिश आवाज को सुनने को।

Thursday, January 28

क्यों यमदूत बनते जा रहे हैं डाक्टर

पिछले हफ्ते की कुछ ऐसी घटनाएं हुई, जिसने डाक्टरी पेशे को निश्चित तौर पर कलंकित किया है। चाहे वो उदयपुर में डाक्टरों की लापरवाही से हुई नवजात की मौत का मामला हो या फिर मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले में नसबंदी शिविर में आपरेशन के दौरान महिला के पेट में छोड़ी गई दस से ज्यादा कैंची का मसला। आखिर क्यों भगवान का दूसरा रूप समझे जाने वाले इतने निर्दयी हो गए हैं? आखिर क्यों ये गलती पर गलती करते जाते हैं और कहीं से बुलबुला तक नहीं उठता? क्या इन्हें किसी की जान लेने का लाइसेंस दे दिया गया है या इन्होंने लापरवाही से हुई मौत से मुंह फेरने की कसम खा रखी है। माजरा और हकीकत क्या है, इसे हर शख्स शिद्दत के साथ महसूस करता है।

सबसे पहले बात शुरू करते हैं राजस्थान के उदयपुर की। जहां ए नवजात की जिंदगी उदय होने के कुछ ही घंटे में अस्त हो गई। वो भी उनके हाथों, जिनसे मौत की उम्मीद कोई नहीं करता। जन्म लेने के बाद तीन दिन तक दर्द को झेलते नवजात ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों की लापरवाही ने एक परिवार के खुशियों का गला घोंट दिया। अब अस्पताल प्रशासन मामले की लीपापोती करने में जुटी है जबकि जिला प्रशासन जांच कर रिपोर्ट देखने की बात करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल रही है। डाक्टरों की लापरवाही का यह एक मात्र उदाहरण नहीं है। आखिर डॉक्टरी जैसे संवेदनशील और ध्यानकेंद्रित पेशे में लापरवाही क्यों होती है। जीरो टोलरेंस जैसे क्षेत्र में ऐसी लापरवाह डॉक्टरों के लाइसेंस रद्द क्यों नहीं होते। उन पर हत्या का मामला क्यूं नहीं चलाया जा सकता?

डॉक्टर की लापरवाही का नया मामला उदयपुर के पन्ना घाय अस्पताल का है। यह सरकारी अस्पताल है। यहां ऑपरेशन से प्रसव के दौरान ऑपरेशन ब्लेड से नवजात का बांह कट गया। डॉक्टरों ने उस जख्म पर मामूली मरहम पट्टी करना भी मुनासिब नहीं समझा। और आखिरकार जख्म की पीड़ा झेलते-झेलते नवजात ने जन्म के तीसरे दिन दम तोड़ दिया। डॉक्टरों को जख्म का ध्यान तब आया जब परिजनों ने नवजात की मौत पर अस्पताल में बवाल मचाया। इस मामले में अस्पताल के डीन कमलेश पंजाबी ने कहा कि आपरेशन के दौरान बच्चे के हाथ में मामूली चोट जरूर आई थी, लेकिन ऐसा होता रहता है। हालांकि उन्होंने माना कि बच्चे की मौत से पहले उन्होंने कहा था कि इस जख्म पर थोड़े टांके लगाने जरूरत है। इधर पीड़ित पिता रंजीत का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान ऑपरेशन ब्लेड से बच्चे का पूरा हाथ कट गया था। अगर डॉक्टरों की बात मान भी लें फिर भी जख्म इतना मामूली नहीं था कि उसका मरहम पट्टी करना भी मुनासिब नहीं समझा।

कुछ ऐसा ही हुआ मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन में। उज्जैन संभाग के शाजापुर जिले के बड़ौद गांव में आठ जनवरी 2010 को मध्यप्रदेश सरकार ने एक नसबंदी शिविर लगाई गई थी। इसमें 35 महिलाओं की नसबंदी होनी थी। 22वां नम्बर कालीबाई का आया। ऑपरेशन डा. वी.वी. जैन कर रहे थे। ऑपरेशन के दौरान गलती से पेट की एक नस कट गई। खून का फचका-सा निकला। शिविर में उससे निबटने का कोई इंतजाम नहीं था। हालात काबू में आते नहीं देख डॉक्टर मरीज को वैसी ही स्थिति में छोड़कर भाग गए । अधूरे ऑपरेशन के समय महिला के पेट में दस से अधिक कैंची व अन्य औजार थे। आनन-फानन में शिविर में मौजूद अन्य नर्स और उसके परिजनों ने पास के बड़े अस्पताल ले जाने लगे, लेकिन रास्ते में ही सांस ने महिला का साथ छोड़ दिया। परिवार कल्याण कार्यक्रम के तहत यह नसबंदी शिविर सरकार द्वारा आयोजित थी।

बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण करने के लिए इस तरह के कार्यक्रम/प्रोजेक्ट शुरू करने वाला विश्व में पहला देश भारत है। आज भी देश में जनसंख्या वृद्धि दर पर काबू पाने के लिए कार्यक्रम जारी है। लगभग पांच दशक बाद भी इस कार्यक्रम को आंशिक सफलता ही मिली है। नसबंदी और जनसंख्या कम करने के लिए जागरूकता शिविरों में इस तरह की लापरवाही होगी। तो सरकार की विश्वसनीयता कमजोर होगी। बड़ौद गांव में आयोजित शिविर में नसबंदी कराने आई महिला कालीबाई की मौत केवल उसकी मौत नहीं है। यह मौत शिविर के सफल आयोजन कराने के दावों का न केवल पोल खोलती है बल्कि सरकार द्वारा किए गए व्यवस्था पर भी सवाल भी खड़े करती है।

कालीबाई की मौत, परिवार नियोजन के लिए सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाली महिला नसबंदी पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है कि इस ऑपरेशन में महिला की जान भी जा सकती है। परिवार नियोजन कार्यक्रम का नाम बदलकर परिवार कल्याण किया गया ताकि जनसंख्या वृद्धि दर पर काबू करने के लिए यह भावार्थ में भी परिवार के कल्याण का भाव पैदा करे। परंतु, काली बाई की मौत ने इस कल्याण के भाव पर ही प्रश्नचिह्न की तलवार लटका दिया। डा. वी.वी. जैन जैसे डॉक्टर की लापरवाही और शिविर के इंतजामात करने वालों ने काली बाई के परिवार का ‘कल्याण’ कर दिया। इस मौत ने आम आदमी के मन में फिर से ‘डर’ को हवा दे दी है। लाखों खर्च के बाद जो विश्वास नसबंदी के प्रति लोगों में पनपा, उसे एक पल में जमींदोज कर दिया गया।

लापरवाही चाहे छोटे स्तर पर हो या बड़े स्तर पर डॉक्टर की लापरवाही हमेशा जानलेवा होती है। कई मामलों में मरीज की जान चली जाती है। काली बाई और नवजात के साथ ऐसा ही हुआ है। मरीज के परिजन डॉक्टरों के साथ बदतमीजी से पेश आते ही डॉक्टरों का यूनियन खड़ा हो जाता है, हंगामा करने के लिए। अस्पताल में डॉक्टरों का हड़ताल शुरू हो जाता है। भले ही अन्य मरीज तड़पते रहें, बिलबिलाते रहें। अपने अहं में हड़ताल करने वाले डॉक्टर डिग्री लेते समय अपने शपथ को भूल जाते हैं। ऐसे समय में डॉक्टरों का यह संगठन चुप क्यों हो जाता है? डॉक्टरों का संगठन सरकार से ए ेसे लापरवाह डॉक्टरों के खिलाफ एक्शन लेने की अपील क्यों नहीं करती? संगठन खुद से ऐसे डॉक्टरों के पंजीयन को रद्द कराने और उनके प्रैक्टिस पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाता? क्यों मरीजों के लिए डॉक्टर और डॉक्टरों के संगठन की संवेदना शून्य हो गई! या फिर डॉक्टर अपने आपको बुद्धिजीवि वर्ग में नहीं मानते और उनके सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। खैर इनको इन सबसे क्या मतलब। एक और मौत का इंतजार कीजिए ...।

-दीपक राजा

Sunday, January 24

संघर्ष का काला हीरो आ॓बामा

पुस्तक ‘बराक आ॓बामा : ब्लैक हीरो इन व्हाइट हाउस’ एक जीवनी है। आ॓बामा एक संघर्ष का नाम है, एक जिजीविषा का नाम है। उनकी फौलादी सोच व दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है कि आज व्हाइट हाउस के ब्लैक हीरो हैं। ये वही आ॓बामा हैं जिन्हें वर्ष 2000 में कांग्रेस अधिवेशन में प्रवेश तक की अनुमति नहीं मिली। आ॓बामा पहले अमेरीकी अश्वेत राष्ट्रपति हैं। अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी व नस्लीय संघर्ष में आंदोलन करने वाले मार्टिन लूथर को आदर्श मानने वाले अश्वेत बराक आ॓बामा का अमेरिकी राष्ट्रपति बनना, केवल आ॓बामा की जीत नहीं बल्कि अमेरीका में ए क नए युग की शुरूआत है। इस पुस्तक में अमेरीकी राष्ट्रपति आ॓बामा के बचपन से लेकर अब तक के कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया है। कहां पैदा हुए और किस जगह पर खड़े हैं? यह अपने हाथ में नहीं होता लेकिन भविष्य क्या है और दुनियां उन्हें किस रूप में याद रखे, यह अपने हाथ में है।

‘यस वी केन’ कहने वाले आ॓बामा ने दुनिया के सामने ए क मिसाल पेश की है। इस पुस्तक को तैयार करने के लिए समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के प्रकाशित लेखों से सहायता ली गई है। अखबारों की कतरनें पुस्तक की शक्ल भी ले सकती है, इस बात को लेखक धामा ने बखूबी दर्शाया है। पुस्तक पठनीय है।

-दीपक राजा

पुस्तक - बराक आ॓बामा : ब्लैक हीरो इन व्हाइट हाउस लेखक - तेजपाल सिंह धामा प्रकाशक - हिन्द पाकेट बुक्स, नई दिल्ली मूल्य - ए क सौ पचास रूपए मात्र

Saturday, January 23

हंगामा क्यू है... थोड़ी सी जो ‘कही’

देर से ब्लॉग में पुब्लिश कर पाया। इसके लिए माफ कर दो...


नई दिल्ली के विज्ञान भवन में सम्पन्न डी कानूनविदों के दो दिवसीय सम्मेलन (21-२२ दिसम्बर) में पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी का भाषण काफी विवादास्पद रहा। ‘आतंकवाद का खात्मा’ विषयक इस सम्मेलन के पहले ही दिन राम जेठमलानी के ‘वहाबी आतंकवाद’ पर चर्चा करना भारत में सऊदी अरब के राजदूत को इतना अखर गया कि वह सम्मेलन से ही उठकर चले गए । स्थिति यह हो गई कि बिगड़े माहौल को संभालने के लिए कानून मंत्री वीरप्पा मोइली को सामने आना पड़ा। सम्मेलन पूर्व कानून मंत्री के वक्तव्य के खंडन और निजी राय बताने में बीत गया। इस सम्मेलन में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के जज के अलावा कई देशों के राजनयिक व कानूनविद मौजूद थे। अखिल भारतीय वरिष्ठ अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष की हैसियत से सम्मेलन में शामिल हुए पूर्व कानून मंत्री राम जेठमलानी ने आतंकवाद फैलाने के लिए सीधे-सीधे वहाबी समुदाय पर अंगुली क्या उठाई हंगामा मच गया। उन्होंने कहा कि ‘‘सउदी अरब के वहाबी लोग पूरी दुनिया में आतंकवाद फैला रहे हैं। ‘वहाब’ युवाओं के दिमाग में जहर घोल रहा है। जो देश वहाब आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, भारत उसके साथ दोस्ती निभा रहा है।’’ जेठमलानी यहीं नहीं रूके, उन्होंने सभी देशों से आग्रह किया कि वे इसके साथ सभी सम्बन्ध तोड़ लें। जेठमलानी के बयान से आहत भारत में सऊदी अरब के राजदूत फैसल-अल-त्राद ने न केवल मंच पर बैठीं राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पास जाकर शिकायत की वरन कार्यक्रम का ही बहिष्कार कर दिया और विज्ञान भवन से बाहर चले गए । विज्ञान भवन से बाहर राजदूत ने जो बयान दिया उसे भी किसी सूरत में उचित नहीं माना जा सकता। राजदूत ने कहा कि ‘भारत में 20 करोड़ मुसलमान रहते हैं और जेठमलानी को इसका ध्यान नहीं है।’ कार्यक्रम का बहिष्कार करने वाले राजदूत को यह समझना चाहिए था कि किसी भी विषय पर जब सम्मेलन होता है, तो उसके हर दृष्टिकोणों पर चर्चा होती है। जरूरी नहीं है कि सारी चीजें आपके पक्ष में हों। वहाबी पर अगर जेठमलानी के वक्तव्य पर इतना बखेड़ा किया गया है, तो जेठमलानी के उस वक्तव्य पर कोई उन्हें शाबाशी क्यों नहीं दे रहा है, जिसमें उन्होंने कहा ‘...दुर्भाग्य है कि आतंकवाद के लिए इस्लाम को बदनाम किया जा रहा है जबकि यहां हिन्दू और बौद्ध आतंकवादी भी हैं।’ आज तक किसी ने इतने बड़े मंच से और सार्वजनिक तौर पर दृढ़ता के साथ यह बात कहने की हिम्मत नहीं की। पेट्रो डालर के आकंठ में डूबे देश के नाराज राजदूत को मनाने के लिए कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने उसी मंच से तुरंत ही पूर्व कानून मंत्री के वक्तव्य को खारिज करते हुए उसे निजी बयान बताया और कहा कि इस बयान से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। कानून मंत्री इसकी घोषणा नहीं भी करते तो भी राम जेठमलानी का यह बयान सरकार का नहीं होता, क्योंकि सम्मेलन में कोई व्यक्ति अपना विचार व्यक्त करने भर से सरकार का नहीं हो जाता। ‘वहाबी आतंकवाद’ की बात करते हुए जेठमलानी ने कहा कि 17वीं (मंच पर बैठे अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के जज अवान ए स. अल-खासनेवह ने इसे दुरूस्त करते हुए कहा 18वीं) शताब्दी में इस मत के लोगों ने कर्बला में कत्लेआम किया और हर उदार व्यक्ति को मार दिया। यह उन सभी लोगों के खिलाफ है जो उदार हैं चाहे वह हिन्दु, ईसाई, यहूदी हो या फिर शिया मुस्लिम ही क्यों न हों। वहाबी मत की शुरूआत 18वीं सदी में सउदी अरब में ए क मुस्लिम विद्वान मोहम्मद इब्न अब्द अल वहाब ने की। उनके अनुसार छठी सदी में इस्लाम के उदय के समय की चार पीढ़ियां ही सही थीं। उसके बाद इसमें कई विकार आए , इसलिए उस समय के इस्लाम को ही इस्लाम माना जाए । मुस्लिम जगत को इस मत के लोग उसी दिशा में पीछे ले जाना चाहते हैं। भारत में वहाबी इतिहास को खंगालने पर पता चलता है कि पतन की आ॓र अग्रसर सिख राज्य के खिलाफ वहाबियों ने जेहाद छेड़ा था। अंग्रेजों के साथ हुई दो लड़ाइयों में जीर्ण-शीर्ण सिख राज्य खत्म हो गया और उसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। उसके बाद वहाबियों ने अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद छेड़ा। अंग्रेजों से खदेड़े जाने पर इन लोगों ने मस्जिद में पनाह ली। जेठमलानी ने वहाबी आतंकवाद की बात करते हुए कहा कि हमने कुरान पढ़ी है। इस्लाम ‘शांति’ का धर्म है। इस्लाम शब्द का उद्भव ‘सलाम’ शब्द से हुआ जिसका अर्थ है ‘शांति’। हर मुसलमान का हक है कि वह इस्लाम के बुनियादी ढांचे को जाने, माने, उस पर अमल करे और पूरी दुनिया को इसके महत्व के बारे में बताए । इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं निकलता कि मार-काट और हथियार के बल पर अपने मत का प्रचार-प्रसार करें, क्योंकि ए ेसा करना आतंकवाद ही है। आतंकवादी वह हर व्यक्ति है जो आतंक और भय का कारण हो, जिसके आतंक व भय से दूसरा डरे। विरासत का दम्भ भर रहे सउदियों को आईना दिखाना बुरा लगता है, जो शायद जेठमलानी के ए क वक्तव्य में ए ेसा ही करने की कोशिश की थी। पेट्रो डालर की मदहोशी में डूबे सउदी अरब के शेख-सुल्तान इस्लाम जगत की तरक्की के लिए क्या कर रहे हैं? पाम आइलैंड टावर व माइल-हाईपावर बनाना, मैच फिक्सिंग का रैकेट चलाना और घुड़दौड़ में पैसा लगाना आदि आदि। भारत-नेपाल सीमाओं में मदरसे खुलवाने में सिमी, हुजी, इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे संगठनों को खुले हाथों से मदद की जा रही है। इन मदरसों में ‘क्या’ सिखाया पढ़ाया जाता है, यह किसी से छिपा नहीं है। ‘मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहां हमारा’ का नारा देने वाले इन अमीर शेखों का हाथ नाइजीरियाल अंगोला, सोमालिया जैसे देशों की मदद के लिए आगे क्यों नहीं आता, जहां लाखों मुसलमान भूखे मर रहे हैं। कानूनविदों का दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जेठमलानी के बयान के तुरंत बाद मोइली साहब को स्पष्टीकरण देने में इतनी हड़बड़ी क्यों दिखानी पड़ी? वहाबी की शिक्षा के लिए उनके शार्गिद जो ‘कत्ताल’, ‘कुफ्र’ और ‘जिहाद’ का खेल रहे हैं, वह किसी से छुपा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी आ॓सामा बिन लादेन का संगठन अलकायदा की प्रेरणा वहाबी विचार ही है। वहाब के प्रभाव में आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान व अरब के कई मुल्क हैं। अक्टूबर 2003 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री रम्सफेल्ड ने प्रश्न उठाया था कि क्या हम उतने आतंकियों को पकड़ या मार रहे हैं जितने आतंकी हमारे खिलाफ कट्टरपंथी धर्मगुरूओं द्वारा तैयार किए जा रहे हैं? स्वाभाविक है इस सवाल का जवाब सकारात्मक नहीं हो सकता। यह प्रश्न उठाने को मजबूर किया है ऐसे आंदोलन ने जो विश्व पर फिर से इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करने की आकांक्षा लिए शरीयत का शासन स्थापित करना चाहता है। इसके लिए कुरान और हदीस का उपयोग कर रहा है। जब तक कट्टरपंथी विचारधारा का प्रभाव बना रहेगा और मुस्लिम समाज के ए क बड़े वर्ग की मानसिकता इस विचारधारा की बंधक बनी रहेगी, तब तक आतंकी गतिविधियां किसी न किसी रूप में सामने आती रहेंगी। दीपक राजा