Showing posts with label अकविता. Show all posts
Showing posts with label अकविता. Show all posts

Wednesday, February 3

छोड़ना बेहतर

जब भी आप परिवार होते हैं
जिम्मेवार होते हैं
आप रोते नहीं
तकदीर पर
करते हैं भरोसा
हाथ पर।

अब कोई
तुल जाए
काटने को हाथ...
तो ...
उसका साथ
छोड़ना बेहतर।

अकेलापन
भले ही
कुछ दिन के लिए
जीवन को
कर जाएगा
... और बदतर।

मगर
कड़ी धूप और
भरी बरसात में
जिसके भी  नहीं कांपेंगे पांव
उसे ही मिलना है
जीवन की छांव। 
-दीपक राजा

Tuesday, October 21

एक चेहरा

एक चेहरा
चुभ जाए
मेरी आंखों में
और मैं
सूरदास बन जाऊँ

तलाश जिंदगी की
जो बदहवाश हो
राधा की तरह
और मैं
कृष्ण न बन पाऊं।

Tuesday, October 7

समय कहाँ...

हम युवाओं को
इतना समय कहाँ
जो सोचे
पथ से भटके हैं
या भटकाए गए हम।

जो भी हो
रोटी के टुकडे के लिए
जीवन-म्रत्यु के
झूले पर
लतगाये गए हम।

Tuesday, July 1

प्यार

जिन्दगी में न मिले जिसे प्यार
वो जीवन नहीं जीने के लिए
प्यार का वो हसीं लम्हा
रह जाता है जिंदगीभर याद

प्यार होता ही है वस
मिलकर बिछुड़ने के लिए
घुम रहा है राजा लेकर
वो क्षणिक सुख की याद
सहेजकर उसे है रखा
अपने प्रियतम के लिए

Sunday, June 15

आत्मतुष्टि

तारीख बदलने के साथ
बदलता जा रहा है दिशा और दशा
चाहे कोई भी एजेन्सी हो
पैसे पर बिक रहे हैं
और दिख भी रहे हैं बिकते हुए।

बात कोलकाता की देबीवानो हो
रोहतक की सरिता या फ़िर
संसार को समझाने की उम्र मे
कदम रखते-रखते सदा के लिए सुला दी
जाने वाली नॉएडा की कहानी हो।

हम निरीह हो केवल
चर्चा कर निकल लेते हैं
अपनी भड़ास
ब्लागिंग, किसी को मेल
और भेज कर संदेश।

फर्क कुछ पड़ेगा
यह सोचने का वक्त
न हमारे पास है और न आपके
बस आत्मतुष्टी के लिए
केवल व्यक्त करते हैं प्रतिक्रिया।

किसी से शिकायत क्योकर
हम उससे अलग कुछ नहीं
करते हैं केवल दंभ भरने का
गांधी मैदान मे लाठी लहराकर
इराक के खिलाफ अमेरिका को धमकाने का।

Tuesday, June 10

सेमिनार

सेमिनार है यह
कुछ तो ऊब रहे
कुछ तो डूब रहे ।

पर
जरा उन वाचक को देखो
जो अपने वाचन मै
डूब रहे ।