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Sunday, November 6

अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है टीवी चैनल पर एक दिन का बैन

अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं है टीवी चैनल पर एक दिन का बैन
NDTV पर सरकार ने एक दिन का बैन लगाया, उसको लेकर हो-हल्ला मचाया जा रहा है। तथाकथित बुद्धजीवियों को लग रहा है कि यह आपातकाल के दौर की आहट है। उन्हें या तो स्टंट करने में मजा आता है या किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। या फिर जिस बौद्धिकता को लेकर अपने आन पर गुस्ताखी मान रहे हैं, वह उसके लायक हैं ही नहीं। पूरे देश को पता है कि आपातकाल में पूरी मीडिया ही नहीं देश के एक-एक लोगों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को निलंबित कर दिया गया था। NDTV पर एक दिन के ऑफ एयर करना, वह भी उनकी गलत रिपोर्टिंग के कारण, आपातकाल की आहट कैसे हो सकता है। 
केंद्र सरकार ने NDTV पर सिर्फ एक दिन के लिए ऑफ एयर होने का नोटिस दिया। इतने में ही तथाकथित बुद्धजीवी बिलविला उठे। विशेषकर जो वामपंथी विचारधारा से हैं या उससे प्रभावित हैं। वामपंथी विचार को मानने वालों या उनकी ओर झुकाव रखने वालों को देश हित से कभी कोई मतलब नहीं रहा। उन्हें स्वहित सबसे प्रिय है। चाहे इसके लिए देश की सुरक्षा, अस्मिता, सामाजिक ताना-बाना जाए चूल्हे में।
एक अंतर-मंत्रालय समिति ने सरकार को NDTV पर 30 दिन के ऑफ एयर करने की सिफारिश की थी। केंद्र सरकार सिर्फ मीडिया चैनल और उससे जुड़े पत्रकारों को अहसास कराना चाहती थी। इसलिए चैनल के आर्थिक पक्ष को ध्यान रखते हुए सिर्फ एक दिन का बैन लगाया। सरकार चाहती तो हूबहू शब्दश NDTV पर 30 दिनों के लिए बैन कर सकती थी लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। यह केंद्र सरकार की भलमानसी है।
इस तरह का चैनल पर बैन पहली बार नहीं लगी। पहले भी सरकारें मीडिया चैनल के प्रसारण पर रोक लगाती रही है। उसके कुछ उदाहरण -
  • 2005 में सिने वर्ल्ड में रात में एडल्ट मूवी दिखाने के कारण पूरे एक महीने के लिए बैन किया गया था।
  • 2007 में एक महीने के लिए जनमत चैनल पर एक महीने का बैन लगाया गया। उसे गलत स्टिंग चलाने का दोषी पाया था।
  • 2007 में एफटीवी और एएक्सएन को दो माह के लिए प्रतिबंधित किया गया।
  • 2015 में भारत का नक्शा गलत दिखाने पर अलजजीरा पर 5 दिन का बैन लगाया गया था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है जिसकी व्याख्या अनुच्छेद 19 में विस्तार से की गई है। इसी के तहत पत्रकारिता यानि मीडिया से जुड़े संस्थानों और पत्रकारों को भी अधिकार प्राप्त है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी को भी, कुछ भी बोलने, प्रदर्शन करने या फिर प्रसारण करने का अधिकार नहीं है। संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है स्वच्छंदता का नहीं। अनुच्छेद 19 के अनुसार, राज्य के पास संविधान और कानूनों के तहत इस स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का अधिकार है। कुछ विशेष परिस्थितियों में, जैसे- बाह्य या आंतरिक आपातकाल, राष्ट्रीय सुरक्षा आदि।

एनडीटीवी पर एक दिन के लिए बैन को लेकर जिस तरह से हायतौबा मचा है, विधवा विलाप हो रहा है। इसको राजनीतिक रंग देने में जुटा एक खास गुट है, जो कभी जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे को भी अभिव्यक्ति की आजादी मान रहे थे। स्वतंत्रता के नाम पर कभी देवी-देवताओं की नग्न पेटिंग्स बनाई जाती है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर, लोकतंत्र के नाम पर भौड़े प्रदर्शन को जनता समझ रही है। 
-© दीपक कुमार 

Monday, August 22

अदद एक नेत्र विशेषज्ञ की, वीरभद्र सिंह के लिए

उम्र बढ़ने के साथ-साथ ऐसा होता है, आदमी ऊंचा सुनने लगता है। दिखाई कम देने लगता है। वीरभद्र सिंह के साथ भी कोई नई बात नहीं हो रही है। इस बात को जो समझ लेते हैं, वह नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लेते हैं। उनकी सलाह पर फिर चश्मा या कांटेक्ट लैंस लगाते हैं।

हालांकि उम्रदराज लोग इस बात के लिए तब तक राजी नहीं होते कि उनकी नजरें कमजोर हो गई, या सुनने की क्षमता क्षीण हो रही है, जब तक कि नुकसान न हो जाए। केंद्रीय लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री वीरभद्र सिंह भी कुछ ऐसे ही हैं। जन्माष्टमी के मौके पर बांके बिहारीजी का दर्शन करने गए मथुरा। वहां उन्होंने अन्ना के आंदोलन और उनके समर्थकों की टोली को भीड़ की संज्ञा दे दी। उन्होंने यहां तक कह दिया कि भीड़ तो मदारी भी जुटा लेता है।

अन्ना के समर्थकों का समूह और मदारी के भीड़ में अंतर नहीं कर पाने में केंद्रीय मंत्री का दोष नहीं है। एक तो उम्र का तकाजा है। दूसरा उनका फैमिली डॉक्टर लापरवाह हो गया है। मंत्री महोदय की नजरें कमजोर हो गई और उसने ध्यान नहीं दिया। नजरें कमजोर होगी तो अंतर आदमी कहां कर पाता है। दुर्योधन की मौत के बाद धृतराष्ट्र भीम और के पुतले में अंतर कहां कर पाये थे। एक तो मंत्री महोदय उमरदराज हैं और उनकी पार्टी और अधिक उम्रदराज।
पार्टी तो इतनी उम्रदराज है कि पार्टी लगभग अंधी हो गई। उसे दिखाई भी नहीं दे रहा है कि रास्ता आखिर है तो है किधर। चारों और दिख रहा है अन्ना अन्ना ...

Wednesday, February 11

नैनों के लिए इंतज़ार कर लो शानदार सवारी कहने के खातिर


२००७ में रतन टाटा ने जब विश्व की सबसे सस्ती कार की बात की तो लोगों ने काफी मज़ाक बनाया था पेपर में कार्टून बना कर... अब नैनों से भीखारी सड़क पर भीख मांगता दिखेगा। कहीं ये लिखा गया की शहरों में ट्रैफिक अभी ही बहुत है... नैनो आने के बाद पार्किंग की मुसीबत खड़ी होगी।

अपने जिद पर कायम रहने वाले रतन टाटा के जन्म दिन पर उनकी कंपनी हर विरोध का सामना करते हुए सबसे पहले ३००० कार लौंच कर रही है... लेकिन इसमे आम आदमी को नही दिया जा रहा है... केवल सेलिब्रिटी को मिल रहा है। सबसे पहले देश की पहली नागरिक रास्त्रपति पाटिल को मिलेगी नैनो...

लोग जो भी कहें इस कदम को मुझे लगता है यह कदम भी आम आदमी के लिए हितकर ही है, आप कुछ भी खरीदतें है तो इनता जरूर ध्यान रखते है की उससे थोड़ा सा ही सही शान बढे, कमी न हो।

रास्त्रपति, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा, धोनी जैसे लोगों के पास नैनो होता है उसके बाद आम आदमी इसे खरीदेगे तो यही नैनो शान की सवारी होगी जिसे लोग कभी भिखारी के लिए तमगा दे गए...

Friday, October 31

पूर्वांचली एक मिशाल है...

देश का कोई भी कोना किसी एक का नही है, भारतीय होने के नाते कोई भी कही भी आ जा सकता है, रोजी रोटी खा कमा सकता है... लेकिन किंतु परन्तु करने के लिए कुछ तथाकथित नेता टाइप लोगों ने देश को क्षेत्र में बाँट रहे हैं... कहाँ तक सही है यह हम और आप को सोचना है...

बोलने को तो नेता बोल लेते हैं लेकिन सच में ये नेता कहलाने लायक हैं क्या? राज ठाकरे जैसे लोग नेता नही... कबीले के सरदार हुआ करते हैं...

इन सरे राजनीती के बीच हम सारे एक बात भूल रहें है की राजनीतिक पार्टियों का रूख क्या है... अभी मुंबई में पूर्वांचली (बिहार और यूपी) को निबटाया जा रहा है, इससे पहले असम में कुछ ऐसा ही हुआ था... दोनों स्थानों पर कांग्रेस की सरकार है... सताए जाने वाले क्षेत्रों मने कांग्रेस मृतप्रायः पहले से ही है... इस घटना के बाद पुरी तरह से सुपदा साफ होना चाहिए...

शरद पवार की पार्टी का वैसे तो कोई विशेष पकर नही है इस क्षेत्र में लेकिन जो भी थोड़ा बहुत है ख़तम होना जरुरी है...
देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है बीजेपी जो महाराष्ट्र में शिव सेना के साथ गठबंधन करके सत्ता में आने का ख्वाब संजोये है... तभी इस मुद्दे पर चुप्प है... बीजेपी को नही भूलना चाहिए की बिहार और यूपी ऐसा प्रान्त है की इसके समर्थन के बगैर आज तक कोई सत्ता पर काबिज नही हो सका है। जो होने की कोशिश किया वह नही टिक पाया... बीजेपी को चुप्पी का परिणाम भुगतना पड़ेगा...

भाषाई आधार पर आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र जल रहा था, तब उसे बचाने के लिए उत्तर भारत के बजाये सरे कारखाने दक्षिण में लगाया गया इसका मतलब ये थोड़े है की मुम्बैकर के अलावा कोई मुंबई में न रहे...

देश और देश के राज्यों को नही भूलना चाहिए की... बिहार और पूर्वी यूपी ऐसा क्षेत्र है जहाँ संघर्ष के बाद नेतृत्व करने वाले नेता निकलते है... बुढ्ढे होने के बाद भी जेपी १९७४ का आन्दोलन का नेतृत्व करते है तो नीतीश, सुशिल और लालू जैसे नेता सामने आते है, बी एच यु का आन्दोलन होता है तो चंद्रशेखर पैदा होता है... कोई दादागिरी करके चांदी के चम्मच के साथ पैदा नही होता है राजनीती करने के लिए...

एक बेरोजगार और फ्रस्टेट युवक जब छोटी घटना को अंजाम देकर देश की राजनीती में हलचल ला सकता है... शेर के मांद में पहुँच कर... पढ़े लिखे और अधिकारी टाइप तो मुंबई में पहले से मौजूद है... सबने मन बना लिया तो क्या होगा मुंबई का... सोचकर देखना धुरंधरो राजनीती के... १९४२ का आन्दोलन किसी नेता का नही जनता का था, १८५७ का विद्रोह किसी राजनेता ने नही किया था, १९७४ का छात्र आन्दोलन किसी पार्टी ने नही किया था... मुट्ठीभर छात्र काफी है... मामले को सुलझाने के लिए... मिटा दो शिवसेना और मनसे को जड़ से... संकीर्ण मानसिकता वाले नेताओ के पुतले मत फूकों... जिन्दा जला दो... कुछ समय के लिए देश सह लेगा...

आख़िर थोड़े थोड़े तड़प तड़प कर मरने से अच्छा है की मिटा दे एक बार में....

Tuesday, October 28

होश में आओ राज

राज ठाकरे की राजनीती ने पटना के राहुल राज जैसे सीधे सरल आदमी को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया। राज की चमचागिरी कर रही कांग्रेस एनसीपी सरकार ने पुलिस को हत्या करने का आदेश दे रखा है शायद... बिहारी और पूर्वांचली की तभी तो सारी हदों को तोड़ कर समर्पण करने के बदले हत्या करती है राहुल राज का... पेट और माथे पर गोली मरकर...

आज मन नही कर रहा है की दीपावली में दीप और पटाखा जलाएं... मन खिन्न हो गया... ब्लैक आउट करेंगे आज के दिन बिना कोई दीप जलाये...

राज ठाकरे और महारास्ट्र के लोगों को... सभी राजनितिक पार्टियों को भी समझना होगा... उसकी राजनीती बीना पूर्वांचली के सपोर्ट के जींदा नही रह सकता है...

एक नही हजारों है राह में तैयार मिटने को... क्षुद्र राज के लिए नही अपनी आन, बाण, शान के लिए...

Tuesday, October 21

एक चेहरा

एक चेहरा
चुभ जाए
मेरी आंखों में
और मैं
सूरदास बन जाऊँ

तलाश जिंदगी की
जो बदहवाश हो
राधा की तरह
और मैं
कृष्ण न बन पाऊं।

Friday, October 17

एकता परिसद में अनेकता

लगभग पचास सालों में१४ वीं बैठक १३ अक्टूबर को शुरू दो दिन के हुई। साढे तीन साल के बाद राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक दिल्ली में शुरू हुई। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हर तरह की हिंसा की निंदा की गई। सांप्रदायिक हिंसा और आतंकवाद से कडाई से निबटने का फैसला भी इस बैठक में लिया गया।

दो दिन चले इस बैठक में कई बार मतभेद साफ दिखाई दिया। बैठक के शामिल लोग "अपनी डफली अपना राग" अलाप रहे थे। उरिसा और कर्णाटक में उपजी हिंसा (कथित तौर पर सांप्रदायिक) को लेकर बीजद और भाजपा को कशुर्वर ठहराने में स्वयम गृह मंत्री आँखे तरेर रहे थे। उस समय सांकेतिक तौर पर मनमोहन सिंह को कायर करार देने वाले लालू यादव पाटिल की पीठ थपथपा रहे थे।

दूसरी और पोटा जैसे कड़े क़ानून का समर्थन और धर्मपरिवर्तन सम्बन्धी क़ानून बनाने की बात जोरदार ढंग से रखने वाले भाजपा बिग्रेड नेता नरेन्द्र मोदी ने यहाँ तक कह डाला की सरकार उग्रवाद और आतंकवाद के बीच फर्क नही समझती। मानवाधिकार के नाम पर आतंकवादी तत्वों को समर्थन करने वाले बुद्धिजीवियों को अलग-थलग करने की जरुरत पर बल दिया।

बिहार के मुख्यमंत्री बुद्ध की भांति मध्यम मार्ग अपनाते हुए सांप्रदायिक सद्भाव के बारे में कहा गठबंधन के इस युग में सरकारों को सभी समुदायों का ध्यान रखना जरूरी है। नीतीश कुमार जिसकी बात कर रहे थे, एकता परिषद् की बिसात ही इसी पर आधारित है। परिषद् का गठन १९६१ में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी अध्यक्षता में की।

परिषद् के गठन के बाद पहली बैठक ओक्टूबर १९६१ में हुई। बैठक में फैसला लिया गया की साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्राबाद, भाषावाद, और अन्य मुद्दे जिससे राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक में उस मुद्दे पर चर्चा करते हुए समाधान ढूंढा जाएगा।

परिषद् के गठन के बाद से अब तक 1४ बैठके हो चुकी है। राष्ट्रीय एकता और अखंडता जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भारतीय राजनीती कितने जागरूक है इसका अंदाजा अन्तिम तीन बैठक से लगाया जा सकता है। 1२ वीं बैठक नवम्बर १९९२ में हुई कश्मीर और पंजाब के मुद्दे को लेकर लेकिन बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि को लेकर खिंचतान के साथ बैठक ख़त्म हुई। तेरहवीं बैठक तेरह साल बाद अक्टूबर २००५ में हुआ। १४ वीं बैठा वोट की राजनीती के शूली पर चढ़ा...

Sunday, October 5

तस्बीर कहता है क्या... मन

धर्म के ठेकेदारों इसको किस बात की सजा दे दी। ये नन्हीं जान ने क्या बिगडा था तेरा जो जिन्दगी की जलालत दे दी जीने के लिए... अब कौन बनेगा इसका सहारा है जवाब... मिल जाए तो बताना... ।

जिन्दगी का नाम है ऊर्जा, शक्ति, उत्साह और खुशी... मुस्कान तो देखो इसका... ।


रईसजादों की तरह मंहगी और आयातीत शराब तो पी नहीं सकता क्यों बीडी पर पर गए हो स्वास्थय मंत्री जी, क्या कोंग्रेस का हाथ, गरीबों के साथ यही है की गरीबों के खुशी, दुःख बाँटने के हथियार ही छीन लो, चलो माना थोडा नुकसान भी देता है तो क्या आपको नही पता है। बीडी रोजगार से कितने लोगों का पेट भरता है। मंत्री जी जैसे जी रहे हैं जीने दो... यही कह रहा है ये बंद... ।

Monday, September 29

बातों बात में...

जिसे देखो वही पुरानी चीजों को छोड़ कर नए की और दौड़ रहा है। इस दौड़ में काफी कुछ पीछे छुट रहा है इस और कोई ध्यान दे नही पा रहा है, ध्यान नही दे रहा है। यह कहने से पहले ख़ुद को भी देखना पड़ेगा... हम क्या कर रहे हैं।

भाग दौड़ भरी जिन्दगी में लोग कितने भुलाने लागे है अपने को यह अनुभव मुझे आज हो रहा है। अच्छे दोस्तों में एक दोस्त है दीपक रामकृष्ण। कल २८ को जन्मदिन था, मैं उसे विस नही कर पाया, कड़े शब्दों कहें तो भूल गया। याद आया अभी, एक दिन बाद... अब जन्मदिन की बधाई देने में डर लग रहा है।

वह दोस्त जिसके साथ मैंने कॉलेज की जिन्दगी बिताई है, उसे भूल गया। वो भी तब जब कॉलेज के जिन्दगी मैंने ही कभी जिन्दगी के दौड़ का क़दम ताल कहता था। मैंने कभी भगत सिंह को देखा नही और न ही भगत सिंह के बारे में लोगो के मुख से सुना... कुछ सुना भी तो ये... टूटी फूटी शब्दों में याद है... मत धारण करना काया फिर से भारतवासी, देशभक्ती में मिलता है फांसी...

एक बात और याद है... शहीदों की मजार पर, कोई फूल चढाये क्यों, ईंटे उठा कर ले गए, कार में रखने के लिए...
ऐसे में भगत सिंह को पुरी तरह भूल गया नयी पीढी तो क्या करें... नयी पीढी को चाहिए लेटेस्ट मोबाइल, लैपटॉप, मुल्तिप्लेक्स में लड़की का साथ... इसके लिए भगत सिंह आदर्श नही हो सकते हैं।

...वो तो भला हो टीवी वाले का की नौजवानों को लता दीदी की याद दिला दी जैसे ११ अक्टूबर को अमिताभ की याद दिलाएंगे जेपी को भूल कर। जेपी का मतलब जय प्रकाश से लेना भाई जिन्होंने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था। जेपी का मतलब यूपी के कंपनी से बिलकुल मत लेना।

जेपी को याद भी लोग क्यों रखे देखिये जेपी के भक्तों को कल तक कांग्रेस का विरोध करते थे, आज सत्ता की मलाई खा रहे है, लोहिया के लोग भी इसमे पीछे नहीं हैं। ऐसे दौर में नयी पीढी नए व्यक्तित्व की और देख रहा है जो जीवित हैं, अच्छी बात ये है की नए पीढी में अरविन्द केजरीवाल जैसे लोग भी हैं.

Sunday, September 28

धमाके के बाद


शनिवार दिल्ली के लिए सबसे काला दिन बनता जा रहा है। धमाका पर धमाका हो रहा है। लोग कितने डरे है, इसके बचने का उपाय सोचकर रेलिंग पर बैठ गए की मौका मिलते ही कूद जायेंगे, लोगो को बचने के लिए, माँ खड़ी है शायद हौसला बढ़ाने के



एक ये तस्बीर है प्यारे दूरदर्शन का लोगो ने इधर से ध्यान क्या हटाया, इसने मेक अप करना ही छोड़ दिया...

Saturday, September 27

गलती, भूल या और कुछ...

आज सुबह समाचार देखने सुनने को मिला की महज एक दिन की बच्ची को किसी बेदर्द माँ ने पार्क में छोड़ दिया, कुत्ता सड़क पर मुह से घसीटते हुए ले जा रहा था। भले मानस ने देखा और हॉस्पिटल पहुँचा दिया।

आजकल हर बड़े छोटे सभ्य कहे जाने वाले कॉलोनियों में इस तरह की घटना होने लगी है, दस लोग दस बातें होती है। सभ्य कहे जाने वाले लोग, उसमें भी पढ़े लिखे लोग इतना आगे सोच लेते है की उसे सुनकर तो कई बार लगता है गाँव के अनपढ़ अंगूठा छाप लोग ज्यादा समझदार और व्यावहारिक है।

यह सब जो कुछ भी देखने और सुनने को मिलता है, दुनिया और दुनिया के बदलते परिवेश को हम किस रूप में देखते है उस पर निर्भर करता है. किसी के कहने और व्यंग करने से यह मनोवृति बदलेगी नही, बदलने के लिए ख़ुद बदलना होगा.

एक उदहारण है मेरे पास, पढ़े लिखे अपढ़ का. मेरे साथ काम करने वाले एक साथी मित्र है, उमर की बात करे तो शायद उनका बेटा मेरे छोटे भाई के उम्र का होगा। ऑफिस में एक दस साल का लड़का गलियारा में टहल रहा था, जो किसी सहयोगी कर्मचारी का है। उसे देख कर मित्र ने कहा यह किसकी गलती है।

आदत है त्वरित टिप्पणी कर देने की, उसके छूटते ही कह गया भाई, देश में लोग इतने समझदार और पढ़े लिखे लोग नही हैं और न ही सेक्स के मामले में इतने खुले है की बच्चा पैदा करने के लिए सेक्स करे। अक्सर बच्चा गलती का ही नतीजा होता है। मुझसे बेहतर आप बता सकते है क्यूंकि आप शादी सुदा हैं। उसके बाद दोस्त के चेहरे को देख सामने से हट जाना बेहतर समझा...

Tuesday, August 12

कुछ "अभिनव" सिखा गया बिंद्रा

आंखों में मासूमियत लिए आत्मविश्वास के साथ विक्टरी स्टैंड पर अकेला खड़ा अभिनव बिंद्रा को ख़ुद यकीं नही हो रहा था की उसने वो इतिहास रच दिया जिसका एक शतक से देश को इंतज़ार था। बिंद्रा के पिता अवजीत सिंह बिंद्रा ने खुश होकर कहा " अविनव एज सिंह, सिंह एज किंग'। माता बबली बिंद्रा भी बहुत खुश थी क्यूंकि पुरा देश उनके बेटे पर नाज कर रहा है। गोल्ड मैडल जितने के बाद इनामों की झडी लगा दिया खेल से जुड़े संस्थाओं ने और राज्यों की सरकारों ने।

आम भारतीय भले बहुत खुश हो लें, सरकार और सरकारी संस्था खुश हो ले बिंद्रा की इस कामयाबी पर। परन्तु मैडल जितने के लिए जो साजो-सामान और ट्रेनिंग की जरुरत होती है वह न तो सरकर और न ही सुत्तिंग संघ ने मुह्हाया कराया है। वो तो अभिनव के पिता अपने बेटे के लिए कुछ भी करने को तैयार थे इसलिए पिचले दो साल से जर्मनी में ट्रेनिंग दिला रहे थे अपने बल बूते पर। क्यूंकि उन्होंने पलने में ही पूत के मंजील को पहचान गए थे। देहरादून में २८ सितम्बर १९८२ को को पैदा हुए और शैशवावस्था देहरादून में बिताने के बाद चडीगढ़ में जा बसे अभिनव बिंद्रा ऍमबीऐ धारी कोम्पुटर गेम वितरण कंपनी "अभिनव फुतुरिस्ट" के सीईओ भी है।

जसपाल राणा बहुत ही सटीक कहा है की "खेल संघ का अभिनव की सफलता में कोई योगदान नही रहा"। यागदान अगर है तो बस इतना की इन खिलाड़ियों के कारण वो भी अपना सीना चौरा कर लेते है। हमारे देश में पहले होकी अब क्रिकेट पर हर कोई ज्यादा तर्हिज देते है। एसियद में कब्बडी में हर बार गोल्ड मैडल लाने बाले भारतीय टीम पर तो ध्यान जाता नहीं है खेल संस्थाओ को सुत्तिंग, तैराकी आदि अन्य खेल पर कितना ध्यान जाएगा ये कहने की जरुरत नहीं है।

अभिनव बिंद्रा जित गए। कोई भी पीछे रहना नही चाहता, सबने इनामों की घोषणा कर दी। बिंद्रा पर क्या फर्क पड़ेगा दस बीस लाख रूपयों से जबकि इनाम देने वाले को भी पता है, उन्होंने जो काम किया, वह इनाम से कहीं ज्यादा है। इनाम की घोषणा करके हर कोई अपना नाम बिंद्रा से जोड़ते हुए पिंड छुडा लिया। हमें नही लगता है इस से देश के नानिहालों को कोई फायदा मिलेगा।

होना तो यह चाहिए था की देश में और भी 'अभिनव' बने इसके लिए कोई khel प्रतियोगिता के आयोजन की सुरूआत अभिनव के नाम घोषणा होती। प्रतियोगिता के बहने कोई नया हीरो देश और समाज के सामने उभर कर आए। ... बिंद्रा भी अच्छी तरह से जानते है की रोपर जिला में शुत्तिंग प्रतियोगिता नही होती तो वो जीता चैम्पियन नही बन पाते। तब कोई लेफ्टीलेंट कर्नल जे.एस.ढिल्लों कोच के रूप में नही मिलता और आज जहाँ खड़े है वो मंजील होता या नही पता नहीं।


रोपर जिला चम्पियाँशिप जितना उनके लिए तुर्निंग पॉइंट साबित हुआ। वीर भोग्या बसुन्धरा कभी भी हीरों से खली नही रहा है और न रहेगा जरूरत है उसे परखने की। हर "abhinav" ऐ एस बिंद्रा का बेटा नहीं है...

Sunday, August 10

रैली का मतलब...

कल ' अंग्रेजों भारत छोडो आन्दोलन' की ६९ वीं वर्षगांठ थी। इस स्वर्णिम अवसर को याद करने के लिए या यों कहे तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को में नया जोश भरने के लिए युवा रैली का आयोजन दिल्ली में हुआ। कांग्रेस के युवा कार्यकर्ता काफी जोश में दिख भी रहे थे। काग्रेस के युवा बिग्रेड के अध्यक्छ अशोक तंवर कुछ जायदा ही उत्साहित नजर आ रहे थे, शायद युवराज राहुल गांधी को खुश करने का उनका अपना तरीका हो. आजकल क्या कांग्रेस की परम्परा रही है नेहरू परिवार की चरणधूली लेने की। कोई भूल सकता है भला राजीव गाँधी और नारायण दत्त तिवारी के प्रकरण को।

एतिहासिक दिन ९ अगस्त को यादगार बनाने के लिए कांग्रेस के मुख्यालय से राजघाट तक की इक रैली निकाली गयी. कांग्रेस के यूथ सेना एस रैली में इतने उत्साहित थे की उन्हें यातायात नियमों का ध्यान नही रहा. उन्हें लगने लगा की दिल्ली में जो बैठी सरकार हैं वह अंग्रेज जमाने का ही है, इसलिए जितना हो सके भीड़ में सरकारी नियमों को तोडा जाए. अकेले अपने बूते तो नियम तोड़ नहीं सकते क्यूंकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है. भाड़ फोड़ने के कोशिश हुई तो पुलिसिया तंत्र कोशिश करने वालों को तोड़ देगी। रैली के दिन यातायात नियमों की धज्जियाँ ऐसे उडी, मानों रैली इसी के लिए किया गया।


यूथ कांग्रेस के कार्यकार्ता दिल्ली और आस पास में हो रहे बाइकर्स गैंग के बड़े ग्रुप में दिख रहे थे। बिना हेलमेट, दो से ज्यादा सवारी और भी कई नियमों को तोड़ने के कारन शालीन दिखने वाली शीला दीक्छित को पत्रकारों से माफी मांगनी पड़ी।

पुलिस भी आम दिनों से अलग दिख रही थी, अपने आपको सड़क का सम्राट समझने वाले यातायात पुलिस लाचार बेवस नजर आ रही थी। हो भी क्यूँ न इन बाइकर्स के पास नेशनल पास जो था हांथों में, सोनिया, मनमोहन, राहुल गांधी के पोस्टर के रूप में...

राहुल गाँधी को सोचना पड़ेगा ऐसे युवा कर्य्कर्तों के बारे में जो नियमों को तोड़ने में आगे तो थे मगर रैली के महत्व को समझना मुनासिब नहीं समझा... उन्हें भारत को एक नयी दिशा देने की ललक है।

Wednesday, August 6

या कोई दीवाना हँसे....

बारह मिनट छत्तीस सेकेण्ड तक लगातार ठहाके लगाकर हंसने का रिकॉर्ड बना, रिकार्ड एक विलायती महिला के नाम रहा ठहाके प्रतियोगिता का मकसद था "जिन्दगी में का नाम है" का संदेश देना जिंदगी में हँसते रहना भी चाहिए बड़े बुजुर्गों ने कहा है 'हँसते रहो' हंसने से मन हलका रहता है चिकित्सा विज्ञानं का भी मानना है की हँसते मुस्कुराते रहने से स्वास्थय अच्छा रहता है

जिधर देखो वही हंसने हंसाने के लिए नई नई तरकीब निकाल रहा है आजकल तो हर चैनल पर हंसने हंसाने को प्रोग्राम होने लगा है, कोकटेल की तरह कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा भानुमती का कुनबा जोड़ने के लिए हर कोई हँसते मुस्कुराते रहने के लिए इतना दवाब बना दिया की कई बार दिखावे में सामने वाले को देख कर हँसना पड़ता है प्रधान मंत्री की तरह, जो सरकार बनाने से लेकर सरकार बचाने तक हंस रहे हैं भले वो अन्दर से परमाणु के झटके खा रहे हैं खतरे में भी हँसते रहना ही तो जिन्दादिली है लगता हैं फिल्म आनन्द में बाबु मोशे कहने वाले राजेश खन्ना के संदेश ने प्रधान मंत्री का मन मोह लिया है

सुबह शाम हंसने की बात कर रहे हैं तो सुबह शाम पार्कों में घुमाने के लिए जायें तो आपको एक झुंड पार्क के किसी कोने में मिल जाएगा हँसते हुए ये लोग जोरदार ठहाके लगते हैं चुप हो होकर या यों कहें की चुप हो होकर जोरदार ठहाके लगाते हैं ठहाके लगाने वालों में ज्यादातर अपने हिस्से की जिन्दगी काट रहे हैं आजकल तो हर छोटे बड़े शहर में इस तरह हंसने का संक्रमण फैलने लगा है

गौण देहात अभी भी इस संक्रमण से अछूत बना हुआ है गांवो में कोई बेवजह ठहाके लगाकर हँसता हुआ दिख जाए तो लोग यही कहेंगे लगता है यह पागल हो गया है... कांके घुमा लाओ जरा कांके (झारखण्ड) रांची के पास का शहर है यहाँ प्रसिध मनोचिकित्सल्या है, ग्रामीणों की बोली में तो पागलखाना यहाँ वक्त बेवक्त ठहाके सुनाने को मिल जाता हैं यह अलग बात है की ये ठहाका पागलों का होता है

आजकल जहाँ देखे योगाचार्यों का बोलबाला हैं हर चैनल पर कोई कोई हंसने का योगभ्याश करवाकर अपनी दुकान चला रहा है

ऐसा नहीं है की हम नहीं हँसते हैं अब तो हमलोग बेवजह ही ज्यादा हँसते हैं हंसने में बनावटीपन साफ झलकता है यह सामने वाला भी समझता है फिर भी अनजान बनकर चुप रहता है, क्यूंकि हंसने के इस तौर तरीके को वह भी अपनाता है


अब महंगाई को ही लीजिये गरीब की बेटी की तरह महंगाई जल्दी जवान हो गई ऐसे में जिसे देखो वही इसे छेड़ रहा है कभी इसको छेड़ता है तो कभी दक्छिन्पंथी इसको लेकर रार करते हैं हद हो गई, जब घर का मुखिया बाहर था तो करार का बहाना लेकर तकरार पर गए लोग फिर भी हंस रहे हैं अब देखो तो यही लोग फुटकर में खरीददारी करते हुए कह रहे हैं की यार बहुत महँगा सौदा है इन पर दुनिया हंस रही है भी हंसने का मजा ही अलग है

वैसे तो हंसने से कोई भी समस्या आज तक हल तो हुई नहीं रोने से फायदा भी नहीं लगातार रोकर रुदाली की डिम्पल बनकर क्या मिलेगा इसलिए हंसिये क्या पता आप भी बेवजह १२ मिनट के बजाये २० मिनट हंस कर विश्व रिकोर्ड बना लें। हम उन्हें नहीं कह रहे जो रावन को बुरा मानते हों। रामायण कल में यह रिकोर्ड बनाने की बात होती तो तय था की रावन ही विजयी होता अनादिकाल के लिए....

Tuesday, August 5

सुरकचा के लिए जजिया कर ले sarkar

देश में हालात कितने ख़राब हो चले हैं जो लोग कुछ अच्छा करने की कोशिश भी करते हैं उसे भी ग़लत निगाह से देखते हैं। अहमदाबाद धमाके के बाद सूरत में एक एक करके जिन्दा बम मिल रहें हैं। ...और एक संयोग है की अब तक ग्यारह बमों के बारे में एक वीएचपी के करकरता ने पुलिस को सुचना दी। कुछ लोगों को इसमें भी राजनीती दीखता है। इसे छुद्रता पूर्ण व्यव्हार मन लेना अच्छा है।

हम ये तो नहीं कहते की आंतंकवाद कोई विशेष धर्म से जुड़ा हुआ है लेकिन जिस तरह से ज्यादातर भारत में हिंदू के आस्था पर लगातार चोट किया जा रहा है, संदेह विश्वास में बदलता जा रहा है। मुझे तो लगता है की नैना देवी मन्दिर में जो रविवार को घटना हुई। उसमें भी आतंकियों का हाथ है। रोज रोज नए तरीके इजाद करते हैं भय पैदा करने के लिए। यह भी उसी की एक कोशिश है। इसका ये मतलब नही है की हिमाचल सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से बच जायेगी। सरकार को जबाब देना होगा क्यों व्यवस्था नही थी पहले से ऐसी घटना के लिए। लगभग बीस साल पहले भी यहाँ ऐसी घटना हो चुकी है।

सरकारी खजाने से दिक्कत हो रही थी हिन्दुओ के लिए खर्च करने में तो मन्दिर के आमदनी से ही करती। एक अनुमान से मन्दिर के आमदनी का चालीस प्रतिसत यहाँ वेतन देने खर्च होता है।

सरकार को जबाव देना चाहिए शेष खान खर्च होता है, नही है तो हम भक्तो से जाजिया कर ले ताकि कम से कम सुरक्छित तो लोतेगे अपने परिवार के लिए...

Monday, August 4

अनुज के लिए

मेरे छोटे भाई अरविन्द को जन्मदिन की ढेर साडी बधाई
उन्ही की याद में...
मुझसे दूर हैं मगर दिल के करीब हैं
जहाँ भी रहें मस्त रहे, खुश रहे यही aashirvad

मेहनत को अनुज कभी कम नहीं करना
कोई रूठे या कुछ छूटे गम न करना।

चदते जाना है सफलता की सीढियाँ
पहली को ही ना आख़िरी समझना

मुबारक को तुम्हे जिंदगी का नया साल
हर पल हो तेरा कुशी का झरना।

झरनों के बीच मुस्कुराते रहो हरपल
जन्मदिन की तुम्हे दे रहा सुभकामना।

मुश्किल है राजा ख्वाब सजाना
मुश्किल है ख्यालात को अपना बनाना।

Wednesday, July 30

ये क्या हो रहा है ....

इतवार को बंगलुरु और सोमवार को अहमदाबाद के धमाके के बाद सूरत में मीले १८ जिंदा बम के बाद हो रहे राज नेताओ के आरोप-प्रत्यारोप को सुन यही कहा जा सकता है की ये क्या हो रहा है...

एनडीऐ के शासन में संसद के हमले से लेकर आज तक के सभी मामलो में गृह मंत्री का एक ही घिसा-पीटा बयाँ आता है- आतंकवाद को देश की भूमी पर टिकने नही देंगे लेकिन होता इसके ठीक उल्टा है। पोता कानून के ख़त्म करने के बाद थोड़ा जो डर पैदा हुआ था वो भी नही रहा यूंपीऐ के मुस्लमान प्रेम में।

देश को अभी और कुर्बानी देना होगा मुस्लिम तुस्ती के लिए। आप कुर्बानी देना न भी चाहे तो भी भारत सरकार के रूप में बैठे लोग ले लेंगे। कैसे लेंगे ये उनपर छोड़ दीजिए...

कितने दुःख की बात है जो पार्टी कभी साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी के आन्दोलन चलाये गाँधी के नेत्रितत्व में, वही पार्टी साम्राज्यवादी देश से करार करने के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया। लोकतंत्र को भीड़तंत्र बनाने और विश्वास मत के लिए क्रिमिनल सांसदों के मत लेकर, होर्स ट्रेडिंग कर सरकार बचाई।

भाजपा नेता के एक बयाँ के तुंरत बाद गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल का कहना की धमाका गुजरात के दंगे का बदले के भावना का नतीजा है। ऐसे सरकार से कैसे आशा की जाए की जाए की आंतक को जड़ से मिटा सकेगी।

Friday, July 4

लीक से हटती पत्रकारिता

जब भी पत्रकारिता की बात होती है, तो भारत में नारद मुनी बरबस ही याद आते है। चाहे रामायण हो या महाभारत हर तरह के ग्रंथो में नारद की चर्चा संवदिया को तरह जरुरत के हर स्थल पर मौजूद होते थे। पत्रकरीता के सुरुआत की बात करे तो अक्षर ज्ञान... से पहले आपस में मानव सांकेतिक चित्रों को, फिर अछर ज्ञान, गायन आदि को संचार का मध्यम बनाया।

संवाद पहुंचाने का सुंदर वर्णन कालिदास के मेघदूत में भी है। हम सभी जानते है भारतीय स्वंत्रता संग्राम में पत्रकारिता की कितनी अहम् भूमिका रही। अंग्रेजी शासक ने जब अख़बार को बंद करने के लिए काला कानून लाया तो ईश्वर चंद्र विद्या सागर से लेकर लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन करने और भारतियों को अपने पत्र व लेख से जागरूक करने के लिए किस तरह की मेहनत की, यह सबके सामने है। बाल गंगाधर तिलक पहले भारतीय पत्रकार थे जिन्हें पत्रकारिता को लेकर जेल की हवा कहानी पड़ी।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भी पत्रकारिता के महत्व को समझ कर ही हरिजन, जैसी पत्रिका को अंगरेजी शासक के खिलाफ लड़ने के लिए अपना हथियार बनाया। और न जाने मैथिलि शरण गुप्ता, अज्ञेय, प्रेमचंद जैसे कितने लेखक हुए जिन्होंने अपना जीवन इसी माध्यम से राष्ट्र की सेवा को समर्पित किया। ऐसे ही महान लेखकों, पत्रकारों की याद में १६ नवम्वर को प्रेस दिवस का आयोजन किया जाता है। सामाजिक उत्थान को अपना धर्म मानने वाले आज भी ऐसे लेखकों, पत्रकारों, साहित्यकारों की कमी नहीं है। क्यूंकि भारत माता वीरों की जननी है।

हम ये कभी नहीं भुला सकते की यात्री और बाबा नागार्जुन के नाम से विख्यात कवि साहित्यकार को उत्तरप्रदेश सरकार ने आपातकाल के पहले तीन लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की थी, लेकिन आपातकाल लगाने के बाद उन्होंने जैसे ही एक रचना की 'शासन की बन्दूक' जो ऐसी तनी की इस इनाम को पाने के लिए तीन सल् का इन्तजार करना पड़ा। इनाम तब मिला जब केन्द्र और राज्य में सत्ता बदल गयी।

इतिहास गवाह है, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता पेशा के रूप में कभी नहीं रहा और आगे भी ऐसी सम्भावना नहीं दिखाती है। यह एक उद्यम है। एक ऐसा उद्यम जहाँ लोगों की समस्याओ के तह तक जाने, समस्यायों को सुलझाने, जनता और शासन के बीच कड़ी बनने की जिम्मेदारी का निर्वहन करना पड़ता है। इसके बदले में उन्हें मिलता कुछ नहीं बस केवल आत्मसंतुष्टि। तभी तो स्वंत्रता आन्दोलन के दौरान एक अख़बार में संपादक की भरती के लिए विज्ञापन में लिखा था की वेतन के रूप में एक ग्लास पानी, एक सुखी रोटी और इनाम में जेल की हवा। लेकिन आज पत्रकारिता का स्वरुप बदल रहा है।


इलेक्ट्रोनिक मीडिया में रेटिंग बढ़ाने के चक्कर में उमा खुराना जैसे प्रकरण भी सामने आ जाता है। हालाँकि यह बात भी सही है है की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं होता तो कुरुक्षेत्र के हल्देरी गॉव में पाँच साल का बच्चा प्रिंस का बचना मुस्किल था। आपरेशन तहलका, दुर्योधन हर किसी को याद है। परन्तु दौर ऐसा चला है की इन पत्रकारों को पुरस्कार में क्या मिला, हम सबको पता है। पत्रकारिता के बदलते दौर और बढ़ते रोजमर्रा को जरूरत को देखते हुए इतना अवश्य कहा जा सकता है की इस क्षेत्र में आने वाले इच्छुक पत्रकार, साहित्यकार कभी भी इसे रोजगार और पेशा के रूप में न अपनाएँ, क्यूंकि यह क्छेत्र हमेशा चुनौतियों का सामना करने को तैयार रहने को मजबूर करता है।

प्रका‍शित रिपोर्ट ः नव आकाश, गुड़गान्व

Sunday, June 15

आत्मतुष्टि

तारीख बदलने के साथ
बदलता जा रहा है दिशा और दशा
चाहे कोई भी एजेन्सी हो
पैसे पर बिक रहे हैं
और दिख भी रहे हैं बिकते हुए।

बात कोलकाता की देबीवानो हो
रोहतक की सरिता या फ़िर
संसार को समझाने की उम्र मे
कदम रखते-रखते सदा के लिए सुला दी
जाने वाली नॉएडा की कहानी हो।

हम निरीह हो केवल
चर्चा कर निकल लेते हैं
अपनी भड़ास
ब्लागिंग, किसी को मेल
और भेज कर संदेश।

फर्क कुछ पड़ेगा
यह सोचने का वक्त
न हमारे पास है और न आपके
बस आत्मतुष्टी के लिए
केवल व्यक्त करते हैं प्रतिक्रिया।

किसी से शिकायत क्योकर
हम उससे अलग कुछ नहीं
करते हैं केवल दंभ भरने का
गांधी मैदान मे लाठी लहराकर
इराक के खिलाफ अमेरिका को धमकाने का।